Wednesday, October 7, 2015

गो-हत्या पर इन तथ्यों को जानकर हैरान हो जाएंगे आप



पूरे देश में गाय को लेकर चल रही राजनीति के बीच अगर आपसे पूछा जाए कि इस राजनीति की नींव कहां पड़ी तो आप क्या बताएंगे? क्या आपको पता भी है कि कैसे हिंदु तो हिंदु भारत में गाय को लेकर मुस्लिम शासकों ने भी सम्मान व्यक्त किया था? क्या आप जानते हैं कि कई मुस्लिम देशों में गो-मांस नहीं खाया जाता है? आधिकारिक रूप से भारत में पहला स्लटर हाउस किसने और कहां खोला था? इस तरह की तमाम बातें बहुत कम लोगों को पता है। गो-मांस पर चल रहे विवाद के बीच ‘मुसाफिर’ आपको बता रहा है इससे जुड़ी वो तमाम बातें जिसे जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे। तीन किस्तों में यह बातें आपके सामने होंगी। आज पढ़िए पहली किस्त।

किसने कहा गाय हमारी माता है
वेद-पुराणों में गाय को धन, संपदा, समृद्धि का प्रतीक माना गया है। गाय की सेवा को पुण्य कमाने का जरिया बताया गया है। कृष्ण के गोकुल में गाय के सम्मान को पूरी दुनिया तमाम माध्यमों से जानती है। जिस तरह गाय के दूध को सबसे पवित्र माना गया है, उसी तरह गो-मूत्र और गोबर को भी पवित्रता और निरोग होने का प्रतीक माना गया। हाल के दिनों में भी गो-मूत्र से बनी दवाइयों का सेवन किया जा रहा है। गोबर तो गांव के हर आंगन में आपको नजर आ जाएगा।  चाहे शहर हो या गांव, ऊर्जा के लिए गोबर के तरह-तरह के उपयोग होते रहते हैं। वेद पुराणों में गाय की इतनी महत्ता को देखते हुए ही इसे माता का रूप मान लिया गया और कालांतर में यह प्रचलित हो गया, गाय हमारी माता है। हंसी ठिठोली में भी इसका प्रयोग शुरू हो गया, कहा जाने लगा...गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है।
दरअसल गाय के सीधेपन और भोलेपन के कारण ही गाय हमारी माता.... के साथ ....हमको कुछ नहीं आता की तुकबंदी जोड़ दी गई। आज भी यह दो लाइन बड़े चाव से कही और सुनी जाती है।

गाय के सम्मान में पहली ‘हत्या’ चोल वंश में हुई थी
गाय या गो-मांस को लेकर भारत में अब तक न जाने कितने दंगे और फसाद हो चुके हैं। चंद दिनों पहले दादरी में अखलाख की मौत के पीछे भी गो-मांस की अफवाह ही रही। पर आपको जानकर हैरानी होगी कि सदियों पहले गाय को लेकर पहली हत्या चोल वंश के शासन काल में हुई थी। कैसे हुई थी यह हत्या, जानने से पहले आपके लिए जरूरी है कि पहले नीचे के पैरा में चोल वंश के बारे में समझ लें।
 ‘‘चोल वंश दक्षिण भारत के प्राचीन राजवंशों में एक था। इसे दक्षिण भारत के कृष्णवर्ण आर्य समाज का वंशज भी माना गया है। कात्यायन ने भी अपने धर्म ग्रंथों में चोल वंश का विस्तार से जिक्र किया है। कात्यायन ने वैसे तो कई ग्रंथों की रचना की थी, लेकिन ग्रह्य-संग्रह, छन्द:परिशिष्ट, कर्म प्रदीप और अभिधर्म ज्ञान प्रस्थान नामक ग्रन्थ कात्यायन की प्रमुख रचनाएं हैं। विजयालय को चोल वंश का संस्थापक माना जाता है।  850 से लेकर 870-71 ई. तक इन्होंने शासन किया था। विजयालय के बाद चोल वंश में करीब बीस प्रमुख राजाओं का जिक्र आता है। इन सभी ने करीब चार सौ वर्षों तक राज किया। ’’
चोल वंश में हुई घटना की यह प्रतिकात्मक तस्वीर कई किताबों में मौजूद है।

इन्हीं बीस चोलवंशी राजाओं में से एक राजा हुए मधुनिधि चोल। कहा जाता है कि गाय के सम्मान में इन्होंने अपने पुत्र को मौत की सजा सुनाई। कहानी कुछ इस तरह है कि, राजा मधु ने अपने महल के आगे राजा की अंगुठी के साथ घंटी लटका रखी थी। जो कोई भी फरियादी इस घंटी को बजाता था उसे राजा स्वयं न्याय देते थे। एक दिन उस घंटी को एक गाय ने बजाया। राजा जब बाहर आए तो उन्होंने देखा एक गाय उस घंटी को लगातार बजा रही थी। राजा मधु ने दरबारियों से पूरी जानकारी मांगी तो पता चला कि इस गाय के बछड़े की मौत राजा के बेटे के रथ से कुचल जाने से हुई है। राजा ने गाय को न्याय दिया और जिस तरह बछड़े की मौत हुई उन्होंने अपने बेटे को भी उसी तरह मौत देने की सजा सुनाई। इस सजा के बाद काफी वाद-विवाद होने का जिक्र भी धर्म गं्रथों में मिलता है। माना गया कि आधिकारिक रूप से यह पहली गो-हत्या थी। जिस हत्या की सजा हत्या के रूप में सामने आई। किसी पशु को न्याय दिलाने के लिए इतने कड़े दंड का जिक्र भारतीय इतिहास में इससे पहले कहीं नहीं आता है।

इस तरह प्राचीन काल में भारत में जहां सिर्फ हिंदु राज था वहां गाय को लेकर पहला विवाद चोल वंश में ही सामने आया। क्योंकि भारत में उस वक्त मुसलमानों का उदय नहीं हुआ था, इसीलिए गाय को हमेशा से ही पवित्र और पूजनीय मानते हुए इसका सम्मान किया गया। चोल वंश के बाद गाय को लेकर विवादों का सिलसिला मध्यकालीन भारत में शुरू हुआ।
मध्यकाल में दीवारों पर बनी भित्ती चित्रों में भी गायों के सम्मान को दर्शाया गया
 
मध्यकाल में मुसलमानों का आगमन

चोल वंश के शासन में हुई घटना के बाद मध्यकाल से पहले तक गाय को लेकर किसी तरह कोई विवाद सामने नहीं आया। मध्यकालीन भारत अपने आप में कई प्रगति और विनाश का सूचक बना। तुर्कि, अफगनिस्तान, फारस और अरब की तरफ से मुस्लिम शासकों ने भारत में प्रवेश किया। भारत की समृद्धि को देखते हुए इन शासकों की निगाहें भारत में थी। कई प्रांतों पर कब्जा करते हुए इन मुस्लिम शासकों ने भारत में अपनी नींव रखी। इस्लामिक परंपरा में बलिदान के रूप में अरब देशों में भेड़ों और बकरों को मारने का रिवाज था। यह ठीक उसी तरह था जैसे नवरात्र में पशु बलि की प्रथा हिंदु धर्म में है। सेंट्रल और वेस्ट एशियन अरब कंट्रीज में गो-मांस खाने की रिवाज कहीं नहीं था।   पर कहीं-कहीं ऊंट के मांस का सेवन करने की बात जरूर आती है। कालांतर में भारत आए मुस्लिम शासकों ने कई जगह गो-हत्या की शुरुआत की। और गो-मांस का सेवन शुरू किया। धीरे-धीरे बकरीद के अवसर पर गो-मांस का प्रचलन काफी बढ़ गया। और यहीं से भारत में गो-हत्या को लेकर ऐसा विवाद शुरू हुआ जो आज तक कायम है।


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कल आपको पढ़ाऊंगा कैसे कालांतर में मुगल शासकों ने गाय को सम्मान दिया था, कैसे इन्हीं मुगल शासकों में शामिल औरंगजेब ने गो-हत्या की सारी हदें पार कर दी थी। कैसे अंग्रेजों ने गो-मांस के लिए कोलकाता में पहला स्लटर हाऊस बनवा दिया था, जहां हर दिन रुटीन के साथ तीस हजार गायों की हत्या होती थी।
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